नई दिल्ली — हिंद-प्रशांत क्षेत्र के आर्थिक परिदृश्य को नई दिशा देने वाले एक कदम के रूप में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच एक अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा (फ्रेमवर्क) पर बनी सहमति को “ऐतिहासिक मील का पत्थर” बताया है। 6 फरवरी, 2026 को अंतिम रूप दिया गया यह समझौता व्यापारिक तनाव को काफी हद तक कम करता है और ‘मेक इन इंडिया’ पहल के लिए एक शक्तिशाली उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी बात रखते हुए प्रधानमंत्री ने गहरा संतोष व्यक्त किया और इस विकास को “भारत और अमेरिका के लिए बड़ी खुशखबरी” बताया। उन्होंने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के प्रति अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की “व्यक्तिगत प्रतिबद्धता” के लिए उनका आभार व्यक्त किया और कहा कि यह रूपरेखा भारत-अमेरिका साझेदारी की बढ़ती प्रगाढ़ता, विश्वास और गतिशीलता को दर्शाती है।
30 ट्रिलियन डॉलर के वैश्विक बाजार के द्वार खुले
यह अंतरिम समझौता भारतीय निर्यातकों, विशेष रूप से श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए एक रणनीतिक जीत है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया कि यह सौदा भारतीय व्यवसायों को 30 ट्रिलियन डॉलर के विशाल बाजार तक पहुँच प्रदान करता है।
नए नियमों के तहत, अमेरिका भारतीय वस्तुओं पर अपने पारस्परिक टैरिफ (reciprocal tariffs) को घटाकर 18% कर देगा, जो पहले कुछ श्रेणियों में 50% तक उच्च था। इस कटौती के दायरे में कई महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं:
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कपड़ा और परिधान: तिरुपुर और लुधियाना जैसे गारमेंट हब के लिए एक बड़ा प्रोत्साहन।
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चमड़ा और फुटवियर: कानपुर और आगरा के कारीगरों के लिए नए अवसर।
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कार्बनिक रसायन और प्लास्टिक: गुजरात और महाराष्ट्र के औद्योगिक गलियारों को लाभ।
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हस्तशिल्प और होम डेकोर उत्पाद: ग्रामीण शिल्पकारों और लघु उद्यमियों का सशक्तिकरण।
इसके अलावा, एक बार जब अंतरिम समझौता पूरी तरह से औपचारिक रूप ले लेगा, तो जेनेरिक फार्मास्यूटिकल्स, रत्न और आभूषण, तथा विमान के पुर्जों जैसे उच्च-मूल्य वाले क्षेत्रों पर टैरिफ घटकर शून्य होने की संभावना है, जिससे वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी।
“पीएम नरेंद्र मोदी के निर्णायक नेतृत्व में, भारत ने अमेरिका के साथ एक अंतरिम समझौते की रूपरेखा तैयार कर ली है। यह भारतीय निर्यातकों, विशेष रूप से एमएसएमई (MSMEs), किसानों और मछुआरों के लिए 30 ट्रिलियन डॉलर का बाजार खोलेगा, साथ ही हमारी महिलाओं और युवाओं के लिए लाखों नए रोजगार के अवसर पैदा करेगा,” — पीयूष गोयल, केंद्रीय मंत्री।
रणनीतिक उद्देश्य: प्रौद्योगिकी, आपूर्ति श्रृंखला और ‘विकसित भारत’
यह रूपरेखा केवल टैरिफ कटौती के बारे में नहीं है; यह भविष्य की वैश्विक साझेदारियों का एक खाका (ब्लूप्रिंट) है। प्रधानमंत्री मोदी ने जोर देकर कहा कि यह समझौता सुगम और भरोसेमंद आपूर्ति श्रृंखलाओं (supply chains) को मजबूत करेगा, जो महामारी के बाद की वैश्विक व्यवस्था में एक अनिवार्य आवश्यकता है।
रणनीतिक सहयोग की मुख्य बातें:
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निवेश और प्रौद्योगिकी: ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPUs) और डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर सहित हाई-टेक क्षेत्रों में साझेदारी को गहरा करना।
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मेक इन इंडिया: अमेरिकी औद्योगिक मशीनरी और प्रौद्योगिकी के सस्ते आयात से घरेलू निर्माताओं के लिए लागत में कमी आएगी।
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सशक्तिकरण: बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन पर ध्यान, विशेष रूप से कार्यबल में युवाओं और महिलाओं को लक्षित करना।
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आर्थिक सुरक्षा: तीसरे देशों की गैर-बाजार प्रथाओं का मुकाबला करने के लिए निवेश समीक्षा और निर्यात नियंत्रण पर तालमेल।
‘पारस्परिक’ संतुलन: अमेरिकी वस्तुओं के लिए बाजार पहुँच
इस “पारस्परिक रूप से लाभकारी” सौदे के हिस्से के रूप में, भारत सभी अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं और कृषि उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला पर टैरिफ को समाप्त या कम करेगा। इसमें ड्राय डिस्टिलर्स ग्रेंस (DDGs), लाल ज्वार (पशु आहार के लिए), ट्री नट्स, ताजे और प्रसंस्कृत फल, सोयाबीन तेल और वाइन व स्पिरिट शामिल हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत ने अपने सबसे संवेदनशील क्षेत्रों की सफलतापूर्वक रक्षा की है। मक्का, गेहूं, चावल, पोल्ट्री, दूध और पनीर जैसे संवेदनशील कृषि और डेयरी उत्पाद सुरक्षित रहेंगे ताकि ग्रामीण आजीविका और खाद्य सुरक्षा से समझौता न हो। बदले में, भारत अगले पांच वर्षों में 500 बिलियन डॉलर मूल्य के अमेरिकी ऊर्जा, विमान और प्रौद्योगिकी उत्पाद खरीदने का इरादा रखता है।
2026 की इस सफलता का मार्ग
दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों के बीच व्यापारिक संबंधों में पिछले एक साल में काफी उतार-चढ़ाव आए हैं। दंडात्मक टैरिफ के दौर के बाद—जहाँ अमेरिका ने रूसी तेल की खरीद का हवाला देते हुए भारतीय वस्तुओं पर 25% शुल्क लगाया था—फरवरी 2025 में पीएम मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान वार्ता फिर से शुरू हुई।
वर्तमान रूपरेखा इन “टैरिफ युद्धों” को शांत करती है। प्रभावी दर को 18% तक लाकर, भारत की निर्यात दर अब वियतनाम (20%) और अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों (19%) जैसे प्रतिस्पर्धियों से कम हो गई है। यह “सर्वाधिक पसंदीदा” दर्जा भारत के एक क्षेत्रीय खिलाड़ी से अमेरिकी नेतृत्व वाली वैश्विक व्यापार संरचना के केंद्रीय स्तंभ के रूप में परिवर्तन को दर्शाता है।
विकसित भारत का निर्माण
चूँकि राष्ट्र 2047 तक ‘विकसित भारत’ के सपने की ओर बढ़ रहा है, ऐसी वैश्विक साझेदारियाँ अनिवार्य हैं। प्रधानमंत्री ने वैश्विक गठबंधनों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया जो लोगों को सशक्त बनाते हैं और साझा समृद्धि को बढ़ावा देते हैं।
अब जबकि रूपरेखा तैयार है, नई दिल्ली और वाशिंगटन दोनों ही औपचारिक अंतरिम समझौते के कानूनी कागजी काम को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। इसका लक्ष्य जल्द से जल्द कार्यान्वयन करना है ताकि अटलांटिक के दोनों ओर के किसानों, उद्यमियों और नवप्रवर्तकों के लिए एक “जीत-जीत” (win-win) परिणाम सुनिश्चित हो सके।
